लापता हैं घरों से बेटियाँ

एजुकेटेड माँ भी चाहती हैं बेटा, नहीं बदल रही है मानसिकता

महिला-पुरुष सेक्स रेशिओ तो बढ़िया हुआ लेकिन बच्चों में लिंगानुपात घटा और वो भी महिलाओं में शिक्षा वृधि के बाद भी 

माइक्रोबायोलॉजी से एमएससी करने के बाद गार्गी और निखिल शादी प्लान करते हैं। फिर दोनों फैमिली प्लानिंग करते हैं मगर गार्गी अपनी पीएचडी से भी समझौता नहीं करना चाहती। काफी सोच विचार के बाद दोनों नाव में पैर रखने का फैसला लिया जाता है। बच्चे की पैदाइश उसे इस बात की तसल्ली देती है कि बेटा हो गया, काफी है। अब और बच्चा नहीं चाहिए। इसी तरह पोस्ट ग्रेजुएट सायरा ने भी बेटे के जन्म के साथ ही सुकून का सांस लिया। सायरा करियर कॉन्शियस नहीं थी मगर शादी के बाद शौक़िया खोला गया उसका बुटीक ठीक ठाक चल रहा था। पहली बार में अगर बेटी होती तो वो एक बच्चे का चांस और लेती। वहीं सितापुर के एक गाँव में सरिता की पहली बेटी होने के बाद उन्होंने फैसला लिया कि बेटे के लिए एक और चांस लिया जाये। आज वो पांच बेटियों और एक बेटे की माँ हैं।  

इन सभी के घर बेटियों की भी अच्छी परवरिश होती है, बेहतर शिक्षा मिलती है। कई दशकों से लिंगानुपात पर हो रहे शोध में ये बात आई थी कि अगर माँ की शिक्षा बेहतर होगी तो लिंगानुपात भी बेहतर होगा (Bourne and Walker 1991, Inchani and Lai 2008)। लेकिन हाल ही में हुए शोध से ये बात भी सही साबित नहीं हो रही। अलग-अलग शोधों में अलग-अलग निष्कर्ष निकल कर सामने आए। जैसे- (Mayer 1999, Das Gupta and Mari Bhat 1997) और ( Bhalotra and Cochrane 2010) की रिसर्च कहती है कि पढ़ी लिखी महिलाएं कम बच्चे तो चाहती हैं लेकिन बेटे की लालसा उनमें ज्यादा है। ज्यादातर महिलाएं या तो लड़कियों को गर्भ में ही खत्म कर देती हैं या वो सेक्स रेशियो को और भी खराब कर रही हैं। tcfd (Bourne and Walker 1991, Inchani and Lai 2008)  का शोध कहता है कि अधिक शिक्षित मांओं की बेटियां तो कम होती हैं लेकिन  इन कड़कियों के जीवित रहने की संभावना अधिक होती है और इससे सेक्स रेशियो अच्छा हो रहा है। तो आखिर क्या है सच्चाई। 

युनिवर्सिटी ऑफ़ बर्कले में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर प्रदीप झिब्बर, युनिवर्सिटी ऑफ़  ओस्लो की प्रोफेसर फ्रेंचेस्का आर जेनसस और युनिवर्सिटी ऑफ़ नोत्रेदम की प्रोफेसर सुसान आस्टरमैन ने 2001 और 2011 की जनगणना में तहसील वार आंकड़ों की गणना की। वैसे तो जनगणना के अनुसार भारत में 2001 से 2011 के बीच प्रति 1000 पुरुष की तुलना में महिलाओं की संख्या बढ़कर 933 से 940 हो गई है (द इकोनॉमिस्टए 2017, यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड- 2011) । लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस बीच भारत में बच्चों के बीच लिंग अनुपात में गिरावट जारी रहती है। इसको साफ करने के लिए नीचे भारत का नक्शा दिया गया है कि 0-6 साल के बच्चों में बेहतर सेक्स रेशियो आज भी नार्थ-ईस्ट, ओडिशा और छत्तीसगढ़ बाजी मार रहा है (हरे रंग में)।

 क्या कहते हैं वर्तमान आंकड़े 

हम भारत भर के हालिया, व्यापक और अलग-अलग जनगणना डेटा (छिब्बर, जेन्सेनियस और ओस्टरमैन 2021) का विश्लेषण करते हैं। यह तो पहले ही पता हो गया है कि 2001 से 2011 तक बाल लिंगानुपात बिगड़ गया है। रो अगला सवाल है की महिलाओं की शिक्षा में वृद्धि का इसपर क्या असर पड़ा है? पिछले कुछ दशकों के अध्ययन से साफ है कि भारत में महिलाओं की शिक्षा बढ़ने से एक महिला के बच्चों की संख्या (रेड्डी 2003) कम हुई है और उच्च महिला मृत्यु दर (मेयर 1999, दास गुप्ता और मारी भट 1997) पर लगाम लगी है। 

अब बच्चों के लिंगानुपात के बारे में पता लगाने के लिए 2011 की जनगणना के आकड़ों को महिलायों की शिक्षा के आधार पर बांटा गया। ‘निरक्षर’, ‘साक्षर या पांचवी पास ‘, ’10वीं, 12वीं, या स्नातक के बिना विश्वविद्यालय में प्रवेश किया’, और ‘स्नातक या उससे ऊपर’। बेहतर शिक्षा स्तर ने प्रजनन क्षमता और उनके बच्चों की मृत्यु दर पर काफी असर पड़ा है। 

 30-44 वर्ष की आयु की माताओं से जन्म लेने वाले सभी बच्चों के लिंग अनुपात और उनके जीवित बच्चों के लिंग अनुपात को समझने के लिए इस चित्र को देंखें। 

इस चित्र से एक माँ का शैक्षिक स्टार और उससे पैदा हुए बच्चों के लिंग अनुपात के बीच एक साफ नकारात्मक संबंध दीखता है, विशेष रूप से विश्वविद्यालय के स्नातक तक पढ़ी हुई माओं में । मां का शैक्षिक स्तर जितना अच्छा हुआ, उतनी ही कम लड़कियां होती गईं। हालांकि शिक्षित माताओं से पैदा होने वाली लड़कियों के जीवित रहने की संभावना उनके भाइयों की तरह होती है यानी लड़कियों की जीवित रहने की दर तो ज्यादा है मगर बालिकाओं के गर्भपात की समस्या बनी हुई है। ऐसे में शोध से मिलने वाला निष्कर्ष समस्या समाधान के लिए दो अलग-अलग नीतिगत दृष्टिकोणों की और संकेत करते हैं। 

(सोर्स: https://www.ideasforindia.in/topics/social-identity/india-s-missing-girls-women-s-education-and-declining-child-sex-ratios.html)

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